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Jadav Payeng : A Real Hero – 30 सालों की मेहनत की अनकही अनसुनी कहानी

Real Hero - Jadav Payeng
Real Hero – Jadav Payeng

यह अविश्वसनीय, बेजोड़ और अदभुद कहानी है आसाम में रहने वाले एक आदिवासी कि जिसके कामों कि गूंज ब्रह्मपुत्र कि लहरों में बहते, सोंधी जंगली हवाओं में महकते, घने पेड़ों की सरसराहट से होते हुये हज़ारों किलोमीटर दूर दिल्ली में “राष्ट्रपति भवन” तक पहुँचीं | इस सीधे सादे आदिवासी का नाम है जादव ‘मलय’ पायेंग | यह एक ऐसा नाम  है जिसको शायद बहुत कम लोगों ने सुना होगा या उनके बारे मे बहुत कम लोग जानते है | आज इस post के माध्यम से मैं आप सभी को इस झुझारू, दृढ़-निश्चयी और वास्तविक जिन्दगी के हीरो  से रू-ब-रू करवाने जा रहा हूँ |

दोस्तों, तबाही अक्सर लोगों की हिम्मत तोड़ देती है साथ ही उन्हें अन्दर तक झकझोर देती है, वे लोग उस मंजर से उबर ही नहीं पाते है और फिर वो उस जिन्दगी को ही अपनी नियती मानते हुये उसके साथ Adjust कर उसी ढर्रे पर चलते रहते है | लेकिन कुछ दुर्लभ लोग होते हैं जो तबाही से जूझने के बाद इस तरह आगे बढ़ते हैं कि उनका ही नहीं, न जाने कितनों का जीवन सकारात्मक रूप से बदल जाता है | और फिर इस तरह वो हीरो के रूप में इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज करवा देते हैं | वे साधारण होते हुए भी ऐसे असाधारण काम कर जाते हैं जिन्हें करने के लिए बहुत सारी खूबियों की जरूरत होती है। असम के जोरहाट जिले में रहने वाले जादव पायेंग इन्हीं इक्का दुक्का लोगों में से हैं | पायेंग ने ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे अरुणा सपोरी गांव के पास बिना किसी की सहायता के अपने दम पर 35 साल की मेहनत से 1360 एकड़ में एक जंगल खड़ा कर दिया है | जादव इसके मालिक नहीं हैं बल्कि यहां के असली मालिक हैं हिरण, खरगोश, बन्दर, गेंडे, हाथी, दूसरे जंगली जानवर और कभी-कभार यहां डेरा जमाने वाले बाघ | जादव को अपने इस काम के लिए हाल ही में पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया है |

दोस्तों, इस नायक के बारे में बताने से पहले मैं आपको एक छोटी सी जानकारी दे दूँ | ब्रह्मपुत्र नदी को पूर्वोत्तर का अभिशाप भी कहा जाता है | इसका कारण है कि जब यह आसाम तक पहुँचती है तो अपने साथ लम्बी दुरी से बहाकर लायी हुयी मिट्टी, रेत, पहाड़ी पथरीले अवशेष विशाल द्रव-मलबे के रूप मे लाती है, जिससे नदी कि गहराई अपेक्षाकृत कम होकर यह चौड़ाई में फैल किनारे के गाँवों को प्रभावित करती है | मानसून में हर साल इसके चौड़े पाट पेड़-पौधों, हरियाली, जीव-जन्तुओं और गाँवों को अपने संग बहा ले जाते है |ब्रह्मपुत्र नदी का विशालता से फैला हरियाली रहित, रेतीला, बंजर लम्बा तट लगभग रेगिस्तान सा लगता था |

चलिए अब चलते है हमारी कहानी के नायक जादव पायेंग पर | जैसे लोगों को एक घर बनाने में पूरी जिंदगी लग जाती है कुछ वैसे ही तरह-तरह के जानवरों का यह बसेरा आबाद करने में भी जादव को 35 साल लगे | इस मुहिम की शुरुआत भी एक तबाही से हुई. असम में 1979 के दौरान भयंकर बाढ़ आई थी. उस समय 14-15 साल के जादव 10वीं कक्षा की परीक्षा देने के बाद अपने गाँव में बाढ़ का पानी उतरने के बाद इसके बरसाती रेतीले तट पर घूम रहे थे | उसी समय उनकी नज़र लगभग 100 मृत सांपों के गुच्छे पर पड़ी, जैसे जैसे आगे बढ़ते गए तो देखा कि ब्रह्मपुत्र के पुरे किनारे पर मरे हुये जीव-जंतु पड़े हुये है | भूमि कटाव के चलते आसपास की पूरी हरियाली नदी ने निगल ली थी और हरियाली गई तो वहां के पशु पक्षियों का बसेरा छिन गया | इस दर्दनाक सामूहिक निर्दोष मौत के दृश्य ने जादव के किशोर मन को झकझोर दिया | निर्दोष जन्तुओं की उन फटी आँखों वाले तबाही के उस मंजर ने जादव को कई रात सोने न दिया |  तब उन्हें लगा कि एक दिन हम इंसानों की दशा भी ऐसी हो सकती है|

जादव इस घटना से फिक्रमंद थे. इस किशोर को समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा दोबारा न हो इसके लिए वह क्या करे. इसके लिए वे अपने गांव के बड़े-बुजुर्गों से मिले, तो एक बुजुर्ग ने चर्चा के दौरान विचलित जादव को कहा कि यदि ब्रह्मपुत्र के आसपास पेड़ पौधे ही नहीं उग रहे तो इन रेतीले तटों पर जानवरों को बाढ़ से बचने के लिए आश्रय कंहा से मिले | ‘पेड़ कौन-सा होना चाहिए?’ जादव ने तुरंत पूछा | उन्हें जवाब मिला कि इन जगहों पर बांस लगाया जा सकता है | इस किशोर के जेहन में अब कोई संशय नहीं था | यह बात उसके मन में पत्थर की लकीर बन गयी थी कि अगर जानवरों को बचाना है तो पेड़ लगाने होंगें | अगले दिन जादव ने अपने गांव से 50 बीज और 25 बांस के पौधे इकट्ठे किए और 16 साल के जादव पहुँच गया उन्हें ब्रह्मपुत्र के रेतीले किनारे पर रोपने | उन्होंने ब्रह्मपुत्र नदी का एक तटवर्ती द्वीप खोजा और इस पर उन्होंने पौधों को लगाना शुरू किया।

हाईस्कूल में पढ़ रहे जादव ने इसके बाद पढ़ाई छोड़ दी और ज्यादातर समय वहीं बने टापू पर रहने लगे | वे सुबह शाम इन पौधों को पानी देते और हर दिन कुछ नए पौधे लगाते | वे प्रतिदिन वहां जाते रहे और लगातार तीन दशक तक पौधे लगाते रहे, लेकिन पौधों के बढ़ते क्षेत्र को पानी देना एक समस्या बन गया क्योंकि एक व्यक्ति के लिहाज से यह बहुत बड़ा इलाका था। इस समस्या का निदान करने के लिए उन्होंने प्रत्येक पौधे के ऊपर एक बांस का प्लेटफॉर्म बनाया और इस पर छोटे-छोटे छेद वाले मटके लगा दिए। इन मटकों से पानी धीरे-धीरे बहता हुआ नीचे गिरता और उन्हें सूखने से बचाता। एक बार मटके भर जाने पर हफ्ते भर का काम चल जाता था। यह 35 साल पुरानी बात है और और आज का दिन है आप कल्पना कर सकते है कि इन 35 सालों में जादव ने 1360 एकड़ का जंगल बिना किसी सरकारी मदद के लगा डाला | क्या आप विश्वास करेंगे कि एक अकेले आदमी के दम पर लगाये गए इस जंगल में 5 बंगाल टाइगर्स, 100 से ज्यादा हिरण, 150 से अधिक जंगली सूअर, 150 से ज्यादा जंगली हाथियों के झुण्ड, गेंडे और अनेक जंगली जानवर घूम रहे है और हाँ साँप भी जिन्होंने इस अदभुद नायक को जन्म दिया |

जादव कहते हैं, ‘इस जंगल में पशु पक्षियों को देखकर मुझे जो खुशी महसूस हुई उसकी कोई तुलना नहीं की जा सकती | मैं उदयपुर पैलेस में चार-पांच दिन तक रह चुका हूं, यहां राजपरिवार के साथ खाना खाया है लेकिन वैसा माहौल भी इस खुशी के सामने कुछ नहीं है |’

जादव अपने मिशन में कामयाब तो हो रहे थे लेकिन अब नई तरह की समस्या आ रही थी | जंगल में रहने वाले हाथियों ने आसपास के गांवों में घुसना शुरू कर दिया था | वे यहां फसलों को बर्बाद करने लगे और कभी-कभार बाघ भी गांवों में आ जाते | इससे गुस्साए ग्रामीणों ने जादव से कह दिया कि यदि जानवरों ने गांव में घुसना बंद नहीं किया तो वे जंगल में आग लगा देंगे | जादव ने इसका भी उपाय खोज लिया और उन्होंने अब जंगल में केले के पेड़ लगाने शुरु कर दिए | इसका नतीजा यह हुआ कि हाथियों को उनका पसंदीदा आहार जंगल में ही मिलने लगा और उन्होंने गांवों की तरफ रुख करना छोड़ दिया | जंगल में हिरणों की आबादी बढ़ी तो बाघ भी वहीं सीमित हो गए | समस्या सिर्फ इसी मोर्चे पर नहीं थी | जादव को अपने परिवार के लिए आजीविका भी कमानी थी | उन्हें जंगल से प्यार था और वे इससे दूर नहीं जाना चाहते थे सो उन्होंने दुधारु पशु रख लिए | आज वे और उनकी पत्नी व तीनों बच्चे आसपास के गांवों में दूध बेचकर अपना जीवनयापन करते हैं |

जादव आज भी जंगलों का क्षेत्रफल बढ़ाने के लिए सुबह 9 बजे घर से निकलकर 5 किलोमीटर साईकल से जाने के बाद नदी पार करते और दूसरी और वृक्षारोपण कर फिर साँझ ढले नदी पार कर साईकल से 5 किलोमीटर की दुरी तय कर अपने घर पहुँचते है | जादव का काम पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में यह बहुत बड़ी पहल है. लेकिन आश्चर्यजनक और दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि इस असंभव को सत्य कर दिखाने वाले साधक से देश 5 साल पहले तक अनजान था | यह लोहपुरुष अपनी धुन में अकेला आसाम के जंगलों में साईकल पर पौधों से भरा एक थैला लिए अपने बनाये जंगल में गुमनाम सफ़र कर रहा था | यह सबसे पहले 2010 में देश कि नज़र में तब आये जब 2009 में “जीतू कालिता” नाम के एक पत्रकार और Wildlife Photographer जोरहाट जिले में ही पड़ने वाले नदी द्वीप माजुली पर एक स्टोरी करने आए थे | तब उन्हें किसी ने बताया कि 20 किमी दूर एक व्यक्ति ने जंगल लगाया है | कालिता को बड़ी हैरानी हुई कि इस रेतीली जमीन पर कोई कैसे जंगल लगा सकता है | इसी बात को समझने के लिए वे जंगल पहुंच गए | यहां वे पेड़-पौधों को देखते हुए आगे बढ़ रहे थे कि अचानक उन्हें लगा कोई उनका पीछा कर रहा है | पीछे मुड़कर उन्होंने देखा तो ये जादव थे | जादव बताते हैं, ‘मुझे लगा कहीं इस आदमी पर कोई जंगली जानवर हमला न कर दे इसलिए मैं उनके पीछे-पीछे चलने लगा |’ इसके बाद जोरहाट के इस स्थानीय पत्रकार को जंगल की पूरी कहानी पता चली और उन्होंने इन पर एक Documentary Film बनाई – “The Malai Forest” | जिसे देश के नामी विश्वविद्यालयों में दिखाया गया तब जाकर देश-विदेश के लोगों ने भी जादव और उनकी मुहिम के बारे में जाना |

पिछले पांच सालों में जादव देश के बड़े-बड़े शहरों में आयोजित सेमिनारों और बैठकों में भाग ले चुके हैं | यहां तक कि अपने अनुभव बांटने के लिए वे फ्रांस का दौरा भी कर चुके हैं | उनके ऊपर कई Documentary Films भी बन चुकी हैं | Aarti Shrivastav ने भी उन पर एक Documentary Film बनाई जिसका नाम “Foresting Life” था | एक कनाडाई फिल्मकार Macmaster  ने उनके ऊपर “Forest Man” नाम से डॉक्यूमेंटरी बनाई है | यह फिल्म 2014 में रिलीज हुई और इसे कई अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं | एक मीडिया रिपोर्ट में Macmaster कहते हैं, ‘जब मैं वहां गया तो मुझे भरोसा ही नहीं हुआ कि कोई एक आदमी इतने सारे पेड़ लगा सकता है | लेकिन पायेंग के साथ जंगल में और भीतर गया तो देखा वहां बड़े-बड़े पेड़ एक लाइन में और बराबर दूरी पर खड़े थे | यह तो सिर्फ कोई आदमी ही कर सकता है | तब मैं बस चमत्कार की तरह उस जंगल को निहारता रहा |’

जब लोगों ने इनके बारे में जाना तो लोगों को विश्वाश नहीं हुआ और लोग आश्चर्य से सकते में आ गए | एक अकेला व्यक्ति जो कि इतने पिछड़े इलाके से है कि जिसके पास पहचान पत्र के रूप में “राशन कार्ड” तक नहीं है, उसने वन विभाग कि मदद के बिना, किसी भी प्रकार की सरकारी सहायता के बगैर हज़ारों एकड़ में फैला जंगल खड़ा कर दिया | आज उनके नाम पर आसाम के इन जंगलों को “मिशिंग जंगल” या “मलय जंगल” कहते है (जादव आसाम की मिशिंग जनजाति से है) | शेरों द्वारा इनकी आजीविका के साधन पालतू पशुओं को खा जाने के बाद भी जंगली जानवरों के प्रति इनकी करुणा कम नहीं हुयी | जादव कहते है कि “शेरों ने मेरा नुकसान किया क्योंकि वो अपनी भूख मिटाने के लिए खेती करना नहीं जानते है | और अगर आप उनका घर उनका जंगल करोगे तो वो आपको नष्ट करेंगे |”

8 अप्रैल 2015 को महामहिम “राष्ट्रपति” द्वारा देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान “पद्मश्री” से अलंकृत होने वाले जादव आज भी आसाम में बांस के बने एक कमरे के छोटे से कच्चे झोपड़े में अपनी पुरानी दिनचर्या में लीन हैं | तमाम सरकारी प्रयासों, वृक्षारोपण के नाम पर लाखों रूपये के पौधों की खरीद करके भी ये पर्यावरण और वन विभाग वो मुकाम हासिल ना कर पाये जो एक अकेले की इच्छाशक्ति ने कर दिखाया | साईकल पर जंगली पगडंडियों में पौधों से भरे झोले और कुदाल के साथ हरी भरी प्रकृति की अनवरत साधना में इस निस्वार्थ पुजारी को मेरा और पुरे देश का कोटि कोटि धन्यवाद् और सलाम | ढेर सारी शुभकामनाओं के साथ आपको नमन | आपने बरसों पुरानी एक कहावत को गलत साबित कर दिया कि “एक अकेला चना भाड नहीं फोड़ सकता” |

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About Chandan Saini

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4 comments

  1. Bhupesh Gouttam

    Great man yr…. Amazing work
    1000 Salute this man…

  2. Yakeen nhi ho raha abhi tak ki aisa bhi kar sakta h koi gazab n thanks this man

  3. It’s amazing.. I can’t believe that one alone man can make a huge forest..
    Really salute for this real heero…

  4. unbelievable yaar………great man……I became a big fan of this man

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